रिश्तों का उद्देश्य क्या है ?

रिश्तों का उद्देश्य क्या है ?

दोस्तों  यह लेख लिखने के लिए मुझे एक फेसबुक के ग्रुप  से प्रेरणा मिली। ये मेरे अपने विचार हैं। हो सकता है आप इससे सहमत हो या न हो ,किन्तु इस प्रश्न पर विचार जरूर करेंगे।और रिश्तों और समाज के ताने बाने को समझने का प्रयास करेंगे

यह लेख वास्तव में मेरे युवा दोस्तों के लिए है। आइये विचार करते हैं।

हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ।और समाज मे रहने के साथ मनुष्य रिश्ते भी बनाता है।कुछ जन्मजात और कुछ स्वेच्छा से।जो जन्मजात है ,वो तो स्वाभाविक है किंतु हम स्वेच्छा से रिश्ते क्यों बनाते हैं आखिर क्या उद्देश्य है इन रिश्तों का?
अपने चारों तरफ नजर दौड़ाने पर ,और अपने हर रिश्ते के बारे में सोचने के बाद मुझे कोई भी एक रिश्ता ऐसा नही मिला जिसे मैंने किसी उद्देश्य से बनाया हो।
आप खुद इसे परख कर देखो।अपने जन्मजात रिश्तो के अलावा ,बाकी जिनसे भी आपका रिश्ता है, क्या आपने वो किसी उद्देश्य से बनाया थाचाहे? दोस्ती का रिश्ता हो या प्रेमी और प्रेमिका का ।
या पति पत्नी का।ये रिश्ते किसी उद्देश्य से शायद नही बनाये होंगे लेकिन इनका कोई दूरगामी लक्ष्य हो सकता है।
जब पहली दफा आपने अपने प्रेमी को देखा होगा ,और अगर आपके दिमाग मे उसके साथ किसी भी तरह का रिश्ता रहने का ख्याल भी आया होगा ,तोभी आपने उसके उद्देश्य के बारे में शायद ही सोचा हो।आप बस उसका साथ चाह रहे होंगे ।लेकिन केवल साथ चाहना कोई उद्देश्य नही ।क्योंकि साथ आने के बाद उद्देश्य पूरा …और फिर रिश्ता आगे नही बढ़ता।
लेकिन प्रेमी और प्रेमिका के रिश्ते में होता क्या है ? वो सिर्फ साथ नही चाहते बल्कि हमेशा ही साथ रहना चाहते हैं ,जो एक दूरगामी लक्ष्य है, न कि उद्देश्य।
जिन रिश्तों की बुनियाद किसी उद्देश्य पर बनी होगी ,उस रिश्ते की इमारत कभी भी ढह सकती है।
रिश्तों में उद्देश्य नही ,बल्कि समर्पण, समर्थन और त्याग के साथ एक दूसरे के लिए सम्मान और प्रेम चाहिए।
फिर वो रिश्ते लक्ष्य तक पहुचते है ,उस लक्ष्य तक जो रिश्ता बनने के बाद तय होता है।
इसलिए 

जहाँ उद्देश है,वहाँ रिश्ता नही ।

admin@praamodyogiraj.com

Author: Praamod yogiraj

RoyalMonk Praamod yogiraj is a proud Indian roaming all around the country and interacting with youths and discussing sprituality, yoga and all other topics especially about contemporary politics.

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