संवैधानिक भारत या संघी भारत ?

संवैधानिक भारत या संघी भारत ?

आजाद भारत  अपने  ७० बसंत पूरे कर रहा है। इसके लिए देश का हर वो नागरिक जो खुद को भारतीय कहलाने में गर्व महसूस करता हैं बधाई का पात्र है.और निश्चित तौर पे देश हमेशा आधुनिक भारत  की नीव रखने वाले राष्ट्र निर्माताओं गाँधी, नेहरू, अम्बेडकर तथा सरदार पटेल के साथ और भी अन्य कई महान विभूतियों का हमेशा ऋणी रहेगा।इनकी रखी गयी बुनियाद की वजह से ही देश यहाँ पंहुचा। प्रख्यात इतिहासकार रामचन्द्र गुहा अपनी पुस्तक Bharat: Gandhi Ke Baadमें लिखते है की “भारत की आजादी के पहले सत्रह सालों  में शायद उतनी प्रगति तो जरूर हुई ,जितनी इससे पहले की सत्तरह शताब्दियों में भी नहीं हुई थी। “

वाकई इन ७० वर्षो  में देश ने कई मुकाम हासिल किये है ,जिनको देख कर उसका सीना गर्व से भर उठता होगा। चाहे वो  खुद को विश्व  का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाना हो या चाँद पर विजय हासिल करना हो। देश का औधोगीकरण हो या हरित क्रांति का सूत्रपात कर अन्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना  हो।चाहे  पूर्वी पाकिस्तान पर विजय हासिल करना हो या सियाचिन के शून्य से भी नीचे तापमान वाले क्षेत्र में सैनिको को तैनात करना हो.कारगिल विजय हो या गोवा को पुर्तगालियों से वापस लेना हो. देश नित नयी चुनौतियों का सामना करते हुए आज एक विश्व शक्ति  बन चूका है जिसका सम्मान पूरा विश्व करता है।इस  पूरे दौर में कई चुनौतियां आयीं पर देश का लोकतंत्र ,इसका बहुलवाद और संविधान के प्रति सम्मान और विश्वास में कोई कमी नहीं आयी।

आज जब देश अपनी आज़ादी की सत्तरवीं वर्षगांठ  मना रहा है ,देश के संविधान पर ,इसके लोकतंत्र पर तरह तरह की आशंकाओं के  बादल  मंडरा रहे है। इंसानों की कीमत जानवरों से कम हो गयी है। एक संप्रदाय विशेष के लोगों को तरह तरह से  निशाना बनाया जा रहा। हिंसा और घृणा का माहौल  बनाया जा रहा। ऐसे समय पे जब विश्व भारत को  अध्यात्म और शांति का दूत मान रहा ,हम देश में ही रोज  नई घृणास्पद तस्वीरें बना रहे है।धर्म और जाति के  नाम पर बाटने का सिलसिला चल पड़ा है। आज से सत्तर साल  पहले भी धार्मिक उन्माद ,कटटरता और हिंसा का वातावरण बना था जिसके फलस्वरूप देश के  टुकड़े हुए थे। तब भी कट्टरवादी संगठन मानवता को कुचलने का प्रयास कर रहे थे और आज फिर वही प्रयास हो रहा। अब भारत को हिन्दू भारत बनाने  की बातें हो रही।

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग है ,आरक्षण फ़िल्म में- “ इस देश मे दो भारत बसते हैं।” उनका इशारा देश में फैले सामाजिक और आर्थिक भेदभाव से था।लेकिन आज वाकई देश मे दो भारत बस रहे हैं।

  • एक कट्टरपंथियों का भारत जो सत्ता के अहंकार में मदान्ध होकर हमारे नैतिक मूल्यों को कुचलता हुआ ,मानवता की हत्या करता हुआ देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात कर रहा ।इस भारत मे सरकार की आलोचना करना और विरोध करना जो कितना भी जायज हो ,आपको देशद्रोही ठहरा सकता है या हो सकता है पाकिस्तान चले जाने का सुझाव भी मिल सकता है।
  • एक अल्पसंख्यक सम्प्रदाय से आने वाले राजनेता( जिसने पूरा जीवन देश सेवा में समर्पित किया ) की बात सुनने और मनन करने की भी हिम्मत इस देश के प्रधानमंत्री में नही है उल्टे उनपर तंज कसकर उनको संकीर्ण मानसिकता वाला करार दिया जाता है  ।वो एक अलग बात है कि असहिष्णुता बढ़ने की बात से उनकी पार्टी के ही वर्तमानं  उपराष्ट्रपति खुद भी सहमति जता चुके हैं जब वो संसदीय कार्य मंत्री थे।जिन्होंने पत्रकारों के समक्ष ये बात स्वीकार की थी की देश में कुछ असहिष्णुता बढ़ी है।  हमारे पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को भी अपने फेयरवेल भाषण में सहिष्णुता, बहुलवाद और लोकतंत्र पे उपदेश देने की जरूरत पड़ गयी।जबकि 2012 में जब उन्होंने राष्ट्रपति का कार्यभार ग्रहण किया था ,तब उनका भाषण लोकतंत्र ,शिक्षा और प्रेम सद्भाव पर ही केंद्रित था। यह भारत तालिबान से होड़ कर रहा ।यहाँ भी कानून नही ,भीड़ ही पीट पीट कर मार डालती है।
  • दूसरा भारत ,वो है जिसकी स्थापना गांधी जी ने की जिसे नेहरू ने अपने भाषण ट्रस्ट विथ डेस्टिनी से रेखांकित किया ,अम्बेडकर ने अपने संविधान से सुसज्जित किया और पटेल ने उसका एकीकरण करके एकता के सूत्र में पिरोकर मजबूत किया।यह भारत आज भी एकता ,प्रेम बहुलवाद और उदारता में विश्वास रखता है।यह वो देश है जिसने सभी धर्मो और विचारों का सम्मान करना सीखा है।

अब हमें इस सत्तरवी वर्षगांठ पे ये चुनाव करना है, की हमे किस भारत मे रहना है।आप को आधुनिकता से कदम मिलाना है या पौराणिक युग मे वापस जाना है।आपको ये भी निर्णय लेना है ,की आपका विश्वास भारतीय संविधान में है या मनु स्मृति में।आपको ये निर्णय भी अभी लेना होगा कि अपना सर फख्र से ऊंचा तिरंगे के सामने करना है या किसी और ध्वज के सामने।

इस निर्णय से यह निश्चित होगा कि आप स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे है या फिर  उनके साथ मिलकर  भारतीयता को नष्ट कर रहे हो जो स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजो से मिले थे।

चुनाव आपको करना है, संवैधानिक भारत या संघी भारत।

admin@praamodyogiraj.com

Author: Praamod yogiraj

RoyalMonk Praamod yogiraj is a proud Indian roaming all around the country and interacting with youths and discussing sprituality, yoga and all other topics especially about contemporary politics.

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