आई टू हैव, टू ड्रीम्स फार यूथ इंडिया।

आई टू हैव, टू ड्रीम्स फार यूथ इंडिया।

पूर्व भारतीय राष्ट्रपति और युवाओं के आदर्श अब्दुल कलाम जी का मानना था  की सपने जरूर देखने चाहिए।वो अक्सर कहते थे की तारों तक पहुंचने की कोशिश करो ,जिससे कम से कम चाँद तक तो पहुंच ही जाओगे। आखिर एक सपना ही लक्ष्य की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम होता है।

कलाम जी का एक बहूत प्रसिद्ध कथन भी है ,“सपने वो नहीं होते जो नींद  में आते है बल्कि वो होते है जो नींद नहीं आने देते”।

करीब आधा दशक पूर्व अमेरिका में एक अश्वेत मानवाधिकार नेता मार्टिन लूथर किंग ने एक प्रसिद्ध भाषण दिया था “आई हैव ए ड्रीम”। वो सपना था अमेरिकी अश्वेतों को देश में समानता दिलाने का । समाज में भेदभाव को खत्म करने का। और सन २००८ में उनके इसी सपने को पूरा कर एक अश्वेत अमेरिकी नागरिक बराक ओबामा  अमेरिका के राष्ट्रपति बने।

आज भारत की एक तिहाई से भी ज्यादा जनसंख्या युवा है। और यही देश का भविष्य भी। लेकिन क्या देश के राष्ट्रीय पटल पर किसी के पास इन युवाओं के लिए कोई सपना है? या कोई मार्गदर्शक है? शायद कलाम जी के बाद शून्यता आ गयी है ।जरूरत है युवाओं के लिए नये सपने देखने की और उन्हें पूरा करने की।
एक युवा भारतीय होने के नाते मेरे भी कुछ सपने है अपने देश के लिए,अपने युवा भाइयों के लिए। उनमे भी अपने दो सपनो को मै आप लोगों  के साथ बाटना चाहूंगा। क्योंकि ये सपने सिर्फ मेरे नहीं है बल्कि हर देशप्रेमी युवा के हैं और आपके भी हो सकते है। इन दोनों ही सपनो से देश के युवाओं का और देश का ,दोनों का ही भविष्य जुड़ा हुआ है। और इनके पूर्ण होने पर वो भविष्य सुनहरा रंग ले लेगा।

मेरा पहला स्वप्न है कि हर भारतीय युवा स्नातक हो। हालाँकि हमारे देश में हमेशा ही शिक्षा और साक्षरता की बात होती रही है किन्तु अब उतने से काम नहीं चलेगा।  केवल साक्षरता से हम वहां नहीं पहुंच सकते जहाँ   हमें होना चाहिए। इसके लिए हर युवक का स्नातक होना बहुत जरुरी है।

आज के समय में ये और जरुरी हो जाता है जब कुछ भटके युवा कट्टरवादी संगठनों से जुड़ रहे है और कुछ राजनीतिक कट्टरता से प्रेरणा ले रहे है। स्नातक तक शिक्षित होने से निश्चित तौर पे उनका विवेक पोषित होगा। उच्च शिक्षा समय की मांग है और राष्ट्र की भी ।निश्चित तौर पे हमे और वैज्ञानिक, इंजीनियर और शोधकर्ताओं की जरूरत है।

मेरा दूसरा सपना केवल इतना की मै भारतीय फुटबॉल टीम को फीफा विश्वकप में खेलते देखना चाहता हु। जी हाँ सही पढ़ा आपने। ऐसा इसलिए नहीं की मैं  फुटबाल का बहुत बड़ा फैन हु इसलिए,बल्कि इसके पीछे एक गहरा कारन है।फूटबाल के लिए बहुत उच्च स्तर का शारीरक और आंतरिक बल चाहिए।अगर राष्ट्र में इसके लिए जागरूकता और प्रोत्साहन दिया जाये तो निश्चित तौर पे भारतीय  युवाओं का शरीर मजबूत होगा और वो ज्यादा स्वस्थ बनेंगे।

स्वामी विवेकानंदजी का भी कहना था ,कि  मैं भारतीय युवाओं को गीता पढ़ने की बजाय फुटबॉल के मैदान में खेलते देखना चाहता हूँ।क्योंकि जब वो शारीरिक रूप से स्वस्थ और मजबूत होंगे तभी वो गीता समझने में सक्षम होंगे।

हमे कलाम के सपनो का भारत बनाने के लिए ,विवेकानंद के सपनो का भारत बनाने के लिए ,और एक युवा भारत बनाने के लिए हमारे युवाओं को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के साथ साथ विवेकपूर्ण और खोजी भी बनाना होगा।

एक विकसित आत्मनिर्भर और निडर राष्ट्र के निर्माण के लिए स्वास्थ्य,विवेक और युवा चेतना रूपी आवश्यक तत्व हमे इन सपनो को पूरा करने पर अवश्य मिल जाएंगे। मुझे पूर्ण विश्वाश है की हमारा भारत जल्द ही इन सपनो को सच कर देगा।

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admin@praamodyogiraj.com

Author: Praamod yogiraj

RoyalMonk Praamod yogiraj is a proud Indian roaming all around the country and interacting with youths and discussing sprituality, yoga and all other topics especially about contemporary politics.

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